Elastic or Bilateral Supply

Sharing is caring!

Elastic or Bilateral Supply | लोचदार और बिलोचदार पूर्ति

एक सवाल जिसमें किसी ऐसी चीज़ के बारे में पूछा जाए जिस से एक राष्ट्र के सभी वर्ग के नागरिकों की समृद्धता को सुनिश्चित किआ जा सके तो, जवाब में जो सबसे पहला नाम आएगा।

A question to be asked about something that can ensure the prosperity of all classes of citizens of a nation, the first name will come in the answer.


वह उस राष्ट्र की उस क्षमता को कहा जाएगा जिसके अंतरगत वह अपनी पूर्ति को मांग के हिसाब से लोच कर सके। और यह सिर्फ तभी हो सकता है जब उस राष्ट्र में लोचदार पूर्ति के साधन अधिक से अधिक हों। भारत जैसा एक देश जहाँ बिलोचदार पूर्ति पाई जाती है, में यह कैसे सम्हव हो सकता है।

It will be called that capacity of the nation under which it can flex its fulfillment according to demand. And this can only happen when the means of elastic supply are greater in that nation. How can it be realized in a country like India where there is a significant supply?


सबसे पहले एक आम भाषा में लोचदार पूर्ति और बिलोचदार पूर्ति में क्या अंतर होता है ये समझते हैं।

Let us first understand the difference between elastic supply and bilateral supply in a common language.


Elastic Supply | लोचदार पूर्ति

लोचदार पूर्ति से मतलब है की पूर्ति के स्तर को मांग के हिसाब से जब चाहे बहुत ही काम समय में ढाला जा सकता है।

Elastic supply means that the level of supply can be molded according to demand, in a very timely manner.


Bilateral Supply | बेलोचदार पूर्ति

जबकि दूसरी तरफ बिलोचदार पूर्ति का मतलब है की एक बार अगर मांग पूर्ति के स्तर से ऊपर हो जाती है तो उसमें सामंजस्य की स्थिति बनाने के लिए एक समय सीमा तक इंतज़ार करना पड़ेगा।

On the other hand, bilateral supply means that once demand exceeds the level of supply, it will have to wait for a time frame to create a situation of reconciliation.


अब जैसे मन लीजिए कि गेहूँ की पैदावार के बाद मांग को पूरा करने के लिए अगर सारा गेहूँ बेच दिए जाता है तो उसके बाद यदि गेहूँ की मांग बढ़ती है तो उसी वक्त गेहूं की उपलब्धि नहीं हो सकेगी। उसके लिए अगली कटाई तक का इंतज़ार करना पड़ेगा।

Now consider that if all the wheat is sold to meet the demand after the production of wheat, then if the demand for wheat increases then the wheat will not be available at the same time. We will have to wait till the next harvest.


ऐसी स्थिति के कारण भारत में पूर्ति को बिलोचदार पूर्ति कहा जाता है। भारत ही नहीं बल्कि इस दुनिआ का कोई भी बड़े से बड़ा, कामयाब से कामयाब मुल्क बिना तकनीकी विकास के कुदरती पूर्ति को बिलोचदार से लोचदार पूर्ति के साधनो में तब्दील नहीं कर सकता।

Due to such a situation, fulfillment in India is called bilateral fulfillment. Not only India, but no major, successful country of this world can not convert natural fulfillment from the shoddy to the means of elastic supply without technical development.


असल में तकनीकी विकास भी तो साधनो की पूर्ति की क्षमता बढ़ा पाते हैं बस। वो भी एक तरहं से बिलोचदार पूर्ति ही होगी। क्यूंकि उसकी भी एक सीमा तो होगी ही।

In fact, technological development also increases the ability to supply resources only. That too will be a kind of bilateral fulfillment. Because it will also have a limit.


हाँ अगर हर रोज़ तकनीकी विकास होने लगें तो पूर्ति की उस सीमा को बार बार (हर बार मांग के बढ़ने पर) बढ़ाया जा सकेगा। परन्तु यह एक science fiction का तथय लगता है। इस तरहं के तकनीकी विकास मुमकिन नहीं हैं, और इनके भी अपने कुछ नुक्सान होते हैं।

Yes, if technological developments start happening every day, then that limit of supply can be increased again and again (every time demand increases). But this seems to be the fact of a science fiction. Such technological developments are not possible, and they also have their own disadvantages.


इस लिए साधनों की अधिकता के अलावा मौजूद साधनो तथा उनसे प्राप्त होने वाले उत्पाद का सम्भव प्रयोग किआ जा सके। और ये करने के लिए नियोजन प्रकिरिया की ज़रूरत पड़ती है, बड़े नहीं बल्कि हर छोटे स्तर पर।

Therefore, in addition to the plethora of means, the existing resources and the products derived from them can be used. And to do this requires planning process, not on big but every small level.


उत्पादों के हस्तांतरण में कम से कम transaction होनी चाहिए तांकि लागत को काबू किआ जा सके।

There should be minimum transaction in the transfer of products so that the cost can be controlled.

Prince Kataria

I am an educationist blogger and willing to provide best and deep knowledge of my Niche to Indian Public free of cost.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *